Monday, May 28, 2012

कमला के नाम विरजन के पत्र

मझगाँव


‘प्रियतम,

प्रेम पत्र आया। सिर पर चढ़ाकर नेत्रों से लगाया। ऐसे पत्र तुम न लिखा करो! हृदय विदीर्ण हो जाता है। मैं लिखूं तो असंगत नहीं। यहाँ चित्त अति व्याकुल हो रहा है। क्या सुनती थी और क्या देखती हैं? टूटे-फूटे फूस के झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के बड़े-बड़े ढेर, कीचड़ में लिपटी हुई भैंसें, दुर्बल गायें, ये सब दृश्य देखकर जी चाहता है कि कहीं चली जाऊँ। मनुष्यों को देखो, तो उनकी सोचनीय दशा है। हड्डियाँ निकली हुई है। वे विपत्ति की मूर्तियाँ और दरिद्रता के जीवित्र चित्र हैं। किसी के शरीर पर एक बेफटा वस्त्र नहीं है और कैसे भाग्यहीन कि रात-दिन पसीना बहाने पर भी कभी भरपेट रोटियाँ नहीं मिलतीं। हमारे घर के पिछवाड़े एक गड्ढा है। माधवी खेलती थी। पाँव फिसला तो पानी में गिर पड़ी। यहाँ किम्वदन्ती है कि गड्ढे में चुडैल नहाने आया करती है और वे अकारण यह चलनेवालों से छेड़-छाड़ किया करती है। इसी प्रकार द्वार पर एक पीपल का पेड़ है। वह भूतों का आवास है। गड्ढे का तो भय नहीं है, परन्तु इस पीपल का वास सारे-सारे गाँव के हृदय पर ऐसा छाया हुआ है। कि सूर्यास्त ही से मार्ग बन्द हो जाता है। बालक और स्त्रियाँ तो उधर पैर ही नहीं रखते! हाँ, अकेले-दुकेले पुरुष कभी-कभी चले जाते हैं, पर पे भी घबराये हुए। ये दो स्थान मानो उस निकृष्ट जीवों के केन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त सैकड़ों भूत-चुडैल भिन्न-भिन्न स्थानों के निवासी पाये जाते हैं। इन लोगों को चुड़ैलें दीख पड़ती हैं। लोगों ने इनके स्वभाव पहचान किये है। किसी भूत के विषय में कहा जाता है कि वह सिर पर चढ़ता है तो महीनों नहीं उतरता और कोई दो-एक पूजा लेकर अलग हो जाता है। गाँव वालों में इन विषयों पर इस प्रकार वार्तालाप होता है, मानों ये प्रत्यक्ष घटनाँ है। यहाँ तक सुना गया हैं कि चुड़ैल भोजन-पानी माँगने भी आया करती हैं। उनकी साड़ियाँ प्राय: बगुले के पंख की भाँति उज्ज्वल होती हैं और वे बातें कुछ-कुछ नाक से करती है। हाँ, गहनों का प्रचार उनकी जाति में कम है। उन्हीं स्त्रियों पर उनके आक्रमण का भय रहता है, जो बनाव श्रृंगार किये रंगीन वस्त्र पहिने, अकेली उनकी दृष्टि में पड़ जायें। फूलों की बास उनको बहुत भाती है। सम्भव नहीं कि कोई स्त्री या बालक रात को अपने पास फूल रखकर सोये।

भूतों के मान और प्रतिष्ठा का अनुमान बड़ी चतुराई से किया गया है। जोगी बाबा आधी रात को काली कमरिया ओढ़े, खड़ाँऊ पर सवार, गाँव के चारों ओर भ्रमण करते हैं और भूले-भटके पथिकों को मार्ग बताते है। साल-भर में एक बार उनकी पूजा होती हैं। वह अब भूतों में नहीं वरन् देवताओं में गिने जाते है। वह किसी भी आपत्ति को यथाशक्ति गाँव के भीतर पग नहीं रखने देते। इनके विरुद्व धोबी बाबा से गाँव-भर थर्राता है। जिस वृक्ष पर उसका वास है, उधर से यदि कोई दीपक जलने के पश्चात् निकल जाए, तो उसके प्राणों की कुशलता नहीं। उन्हें भगाने के लिए दो बोतल मदिरा काफी है। उनका पुजारी मंगल के दिन उस वृक्षतले गाँजा और चरस रख आता है। लाला साहब भी भूत बन बैठे हैं। यह महाशय मटवारी थे। उन्हें कई पंडित असमियों ने मार डाला था। उनकी पकड़ ऐसी गहरी है कि प्राण लिये बिना नहीं छोड़ती। कोई पटवारी यहाँ एक वर्ष से अधिक नहीं जीता। गाँव से थोड़ी दूर पर एक पेड़ है। उस पर मौलवी साहब निवास करते है। वह बेचारे किसी को नहीं छेड़ते। हाँ, वृहस्पति के दिन पूजा न पहुँचायी जाए, तो बच्चों को छेड़ते हैं।

कैसी मूर्खता है! कैसी मिथ्या भक्ति है! ये भावनाएँ हृदय पर वज्रलीक हो गयी है। बालक बीमार हुआ कि भूत की पूजा होने लगी। खेत-खलिहान में भूत का भोग। जहाँ देखिये, भूत-ही-भूत दीखते हैं। यहाँ न देवी है, न देवता। भूतों का ही साम्राज्य हैं। यमराज यहाँ चरण नहीं रखते, भूत ही जीव-हरण करते हैं। इन भावों का किस प्रकार सुधार हो? किमधिकम

तुम्हारी

विरजन

(2)



मझगाँव

प्यारे,

बहुत दिनों के पश्चात् आपकी प्रेम-पत्री प्राप्त हुई। क्या सचमुच पत्र लिखने का अवकाश नहीं? पत्र क्या लिखा है, मानो बेगार टाली है। तुम्हारी तो यह आदत न थी। क्या वहाँ जाकर कुछ और हो गये? तुम्हें यहाँ से गये दो मास से अधिक होते है। इस बीच में कई छोटी-बड़ी छुट्टियाँ पड़ी, पर तुम न आये। तुमसे कर बाँधकर कहती हूँ - होली की छुट्टी में अवश्य आना। यदि अब की बार तरसाया तो मुझे सदा उलाहना रहेगा।

यहाँ आकर ऐसी प्रतीत होता है, मानो किसी दूसरे संसार में आ गयी हूँ। रात को शयन कर रही थी कि अचानक हा-हा, हू-हू का कोलाहल सुनायी दिया। चौंककर उठ बैठी! पूछा तो ज्ञात हुआ कि लड़के घर-घर से उपले और लकड़ी जमा कर रहे थे। होली माता का यही आहार था। यह बेढंगा उपद्रव जहाँ पहुँच गया, ईंधन का दिवाला हो गया। किसी की शक्ति नहीं जो इस सेना को रोक सके। एक नम्बरदार की मड़िया लोप हो गयी। उसमें दस-बारह बैल सुगमतापूर्वक बाँधे जा सकते थे। होली वाले कई दिन घात में थे। अवसर पाकर उड़ा ले गये। एक कुरमी का झोंपड़ा उड़ गया। कितने उपले बेपता हो गये। लोग अपनी लकड़ियाँ घरों में भर लेते हैं। लालाजी ने एक पेड़ ईंधन के लिए मोल लिया था। आज रात को वह भी होली माता के पेट में चला गया। दो-तीन घरों के किवाड़ उतर गये। पटवारी साहब द्वार पर सो रहे थे। उन्हें भूमि पर ढकेलकर लोग चारपाई ले भागे। चतुर्दिक ईंधन की लूट मची है। जो वस्तु एक बार होली माता के मुख में चली गयी, उसे लाना बड़ा भारी पाप है। पटवारी साहब ने बड़ी धमकियां दी। मैं जमाबन्दी बिगाड़ दूँगा, खसरा झूठाकर दूँगा, पर कुछ प्रभाव न हुआ! यहाँ की प्रथा ही है कि इन दिनों वाले जो वस्तु पा जायें, निर्विघ्न उठा ले जायें। कौन किसकी पुकार करे? नवयुवक पुत्र अपने पिता की आंख बाकर अपनी ही वस्तु उठवा देता है। यदि वह ऐसा न करे, तो अपने समाज मे अपमानित समझाजा जाए।

खेत पक गये हैं, पर काटने में दो सप्ताह का विलम्ब है। मेरे द्वार पर से मीलों का दृश्य दिखाई देता है। गेहूँ और जौ के सुथरे खेतों के किनारे-किनारे कुसुम के अरुण और केसर-वर्ण पुष्पों की पंक्ति परम सुहावनी लगती है। तोते चतुर्दिक मँडलाया करते हैं।

माधवी ने यहाँ कई सखियाँ बना रखी हैं। पड़ोस में एक अहीर रहता है। राधा नाम है। गत वर्ष माता-पिता प्लेग के ग्रास हो गये थे। गृहस्थी का कुल भार उसी के सिर पर है। उसकी स्त्री तुलसा प्राय: हमारे यहाँ आती हैं। नख से शिख तक सुन्दरता भरी हुई है। इतनी भोली है कि जो चाहता है कि घण्टों बाते सुना करुँ। माधवी ने इससे बहिनापा कर रखा है। कल उसकी गुड़ियों का विवाह हैं। तुलसी की गुड़िया है और माधवी का गुड्डा। सुनती हूँ, बेचारी बहुत निर्धन है। पर मैंने उसके मुख पर कभी उदासी नहीं देखी। कहती थी कि उपले बेचकर दो रुपये जमा कर लिये हैं। एक रुपया दायज दूँगी और एक रुपये में बरातियों का खाना-पीना होगा। गुड़ियों के वस्त्राभूषण का भार राधा के सिर है! कैसा सरल संतोषमय जीवन है!

लो, अब विदा होती हूँ। तुम्हारा समय निरर्थक बातो में नष्ट हुआ। क्षमा करना। तुम्हें पत्र लिखने बैठती हूँ, तो लेखनी रुकती ही नहीं। अभी बहुतेरी बातें लिखने को पड़ी हैं। प्रतापचन्द्र से मेरी पालागन कह देना।

तुम्हारी

विरजन



(3)



मझगाँव

प्यारे,

तुम्हारी प्रेम पत्रिका मिली। छाती से लगायी। वाह! चोरी और मुँहजोरी। अपने न आने का दोष मेरे सिर धरते हो? मेरे मन से कोई पूछे कि तुम्हारे दर्शन की उसे कितनी अभिलाषा प्रतिदिन व्याकुलता के रुप में परिणत होती है। कभी-कभी बेसुध हो जाती हूँ। मेरी यह दशा थोड़ी ही दिनों से होने लगी है। जिस समय यहाँ से गये हो, मुझे ज्ञान न था कि वहाँ जाकर मेरी दलेल करोगे। खैर, तुम्हीं सच और मैं ही झूठ। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि तुमने मेरे दोनों पत्र पसन्द किये। पर प्रतापचन्द्र को व्यर्थ दिखाये। वे पत्र बड़ी असावधानी से लिखे गये है। सम्भव है कि अशुद्वियाँ रह गयी हों। मझे विश्वास नहीं आता कि प्रताप ने उन्हें मूल्यवान समझा हो। यदि वे मेरे पत्रों का इतना आदर करते हैं कि उनके सहार से हमारे ग्राम्य-जीवन पर कोई रोचक निबन्ध लिख सकें, तो मैं अपने को परम भाग्यवान् समझती हूँ।

कल यहाँ देवीजी की पूजा थी। हल, चक्की, पुर चूल्हे सब बन्द थे। देवीजी की ऐसी ही आज्ञा है। उनकी आज्ञा का उल्लघंन कौन करे? हुक्का-पानी बन्द हो जाए। साल-भर में यही एक दिन है, जिसे गाँव वाले भी छुट्टी का समझते हैं। अन्यथा होली-दिवाली भी प्रति दिन के आवश्यक कामों को नहीं रोक सकती। बकरा चढ़ा। हवन हुआ। सत्तू खिलाया गया। अब गाँव के बच्चे-बच्चे को पूर्ण विश्वास है कि प्लेग का आगमन यहाँ न हो सकेगा। ये सब कौतुक देखकर सोयी थी। लगभग बारह बजे होंगे कि सैंकड़ों मनुष्य हाथ में मशालें लिये कोलाहल मचाते निकले और सारे गाँव का फेरा किया। इसका यह अर्थ था कि इस सीमा के भीतर बीमारी पैर न रख सकेगी। फेरे के सप्ताह होने पर कई मनुष्य अन्य ग्राम की सीमा में घुस गये और थोड़े फूल, पान, चावल, लौंग आदि पदार्थ पृथ्वी पर रख आये। अर्थात् अपने ग्राम की बला दूसरे गाँव के सिर डाल आये। जब ये लोग अपना कार्य समाप्त करके वहाँ से चलने लगे तो उस गाँववालों को सुनगुन मिल गयी। सैकड़ों मनुष्य लाठियाँ लेकर चढ़ दौड़े। दोनों पक्षवालों में खूब मारपीट हुई। इस समय गाँव के कई मनुष्य हल्दी पी रहे हैं।

आज प्रात:काल बची-बचायी रस्में पूरी हुई, जिनको यहाँ कढ़ाई देना कहते हैं। मेरे द्वार पर एक भट्टा खोदा गया और उस पर एक कड़ाह दूध से भरा हुआ रखा गया। काशी नाम का एक भर है। वह शरीर में भभूत रमाये आया। गाँव के आदमी टाट पर बैठे। शंख बजने लगा। कड़ाह के चतुर्दिक माला-फूल बिखेर दिये गये। जब कहाड़ में खूब उबाल आया तो काशी झट उठा और जय कालीजी की कहकर कड़ाह में कूद पड़ा। मैं तो समझी अब यह जीवित न निकलेगा। पर पाँच मिनट पश्चात् काशी ने फिर छलाँग मारी और कड़ाह के बाहर था। उसका बाल भी बाँका न हुआ। लोगों ने उसे माला पहनायी। वे कर बाँधकर पूछने लगे-महाराज! अबके वर्ष खेती की उपज कैसी होगी? बीमारी अवेगी या नहीं ? गाँव के लोग कुशल से रहेंगे? गुड़ का भाव कैसा रहेगा? आदि। काशी ने इन सब प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट पर किंचित् रहस्यपूर्ण शब्दों में दिये। इसके पश्चात् सभा विसर्जित हुई। सुनती हूँ ऐसी क्रिया प्रतिवर्ष होती है। काशी की भविष्यवाणियाँ सब सत्य सिद्व होती हैं। और कभी एकाध असत्य भी निकल जाय तो काशी उना समाधान भी बड़ी योग्यता से कर देता है। काशी बड़ी पहुँच का आदमी है। गाँव में कहीं चोरी हो, काशी उसका पता देता है। जो काम पुलिस के भेदियों से पूरा न हो, उसे वह पूरा कर देता है। यद्यपि वह जाति का भर है तथापि गाँव में उसका बड़ा आदर है। इन सब भक्तियों का पुरस्कार वह मदिरा के अतिरिक्त और कुछ नहीं लेता। नाम निकलवाइये, पर एक बोतल उसको भेंट कीजिये। आपका अभियोग न्यायालय में हैं; काशी उसके विजय का अनुष्ठान कर रहा है। बस, आप उसे एक बोतल लाल जल दीजिये।

होली का समय अति निकट है! एक सप्ताह से अधिक नहीं। अहा! मेरा हृदय इस समय कैसा खिल रहा है? मन में आनन्दप्रद गुदगुदी हो रही है। आँखें तुम्हें देखने के लिए अकुला रही है। यह सप्ताह बड़ी कठिनाई से कटेगा। तब मैं अपने पिया के दर्शन पाँऊगी।

तुम्हारी

विरजन

(4)



मझगाँव



प्यारे

तुम पाषाणहृदय हो, कट्टर हो, स्नेह-हीन हो, निर्दय हो, अकरुण हो झूठो हो! मैं तुम्हें और क्या गालियाँ दूँ और क्या कोसूँ? यदि तुम इस क्षण मेरे सम्मुख होते, तो इस वज्रहृदयता का उत्तर देती। मैं कह रही हूँ, तुम दगाबाज हो। मेरा क्या कर लोगे? नहीं आते तो मत आओ। मेरा प्राण लेना चाहते हो, ले लो। रुलाने की इच्छा है, रुलाओ। पर मैं क्यों रोऊँ ! मेरी बला रोवे। जब आपको इतना ध्यान नहीं कि दो घण्टे की यात्रा है, तनिक उसकी सुधि लेता आऊँ, तो मुझे क्या पड़ी है कि रोऊँ और प्राण खोऊँ?

ऐसा क्रोध आ रहा है कि पत्र फाड़कर फेंक दूँ और फिर तुमसे बात न करुं। हाँ! तुमने मेरी सारी अभिलाषाएं, कैसे घूल में मिलायी हैं ? होली! होली! किसी के मुख से यह शब्द निकला और मेरे हृदय में गुदगुदी होने लगी, पर शोक! होली बीत गयी और मैं निराश रह गयी। पहिले यह शब्द सुनकर आनन्द होता था। अब दु:ख होता है। अपना-अपना भाग्य है। गाँव के भूखे-नंगे लँगोटी में फाग खेलें, आनन्द मनावें, रंग उड़ावें और मैं अभागिनी अपनी चारपाई पर सफेद साड़ी पहिने पड़ी रहूँ। शपथ लो जो उस पर एक लाल धब्बा भी पड़ा हो। शपथ ले लो जो मैंने अबीर और गुलाल हाथ से छुई भी हो। मेरी इत्र से बनी हुई अबीर, केवड़े में घोली गुलाल, रचकर बनाये हुए पान सब तुम्हारी अकृपा का रोना रो रहे हैं। माधवी ने जब बहुत हठ की, तो मैंने एक लाल टीका लगवा लिया। पर आज से इन दोषारोपणों का अन्त होता है। यदि फिर कोई शब्द दोषारोपण का मुख से निकला तो जबान काट लूँगी।

परसों सायंकाल ही से गाँव में चहल-पहल मचने लगी। नवयुवकों का एक दल हाथ में डफ लिये, अश्लील शब्द बकते द्वार-द्वार फेरी लगाने लगा। मुझे ज्ञान न था कि आज यहाँ इतनी गालियाँ खानी पड़ेंगी। लज्जाहीन शब्द उनके मुख से इस प्रकार बेधड़क निकलते थे जैसे फूल झड़ते हों। लज्जा और संकोच का नाम न था। पिता, पुत्र के सम्मुख और पुत्र, पिता के सम्मुख गालियाँ बक रहे थे। पिता ललकार कर पुत्र-वधू से कहता है - आज होली है! वधू घर में सिर नीचा किये हुए सुनती है और मुस्करा देती है। हमारे पटवारी साहब तो एक ही महात्म निकले। आप मदिरा में मस्त, एक मैली-सी टोपी सिर पर रखे इस दल के नायक थे। उनकी बहू-बेटियाँ उनकी अश्लीलता के वेग से न बच सकीं। गालियाँ खाओ और हँसो। यदि बदन पर तनिक भी मैल आये, तो लोग समझेंगे कि इसका मुहर्रम का जन्म हैं भली प्रथा है।

लगभग तीन बजे रात्रि के झुण्ड होली माता के पास पहुँचा। लड़के अग्नि-क्रीड़ादि में तत्पर थे। मैं भी कई स्त्रियों के पास गयी, वहाँ स्त्रियाँ एक ओर होलियाँ गा रही थीं। निदान होली में आग लगाने का समय आया। अग्नि लगते ही ज्वाल भड़की और सारा आकाश स्वर्ण-वर्ण हो गया। दूर-दूर तक के पेड़-पत्ते प्रकाशित हो गय। अब इस अग्नि-राशि के चारों ओर ‘होली माता की जय!’ चिल्ला कर दौड़ने लगे। सब के हाथों में गेहूँ और जौ की बालियाँ थीं, जिसको वे इस अग्नि में फेंकते जाते थे।

जब ज्वाला बहुत उत्तेजित हुई, तो लेग एक किनारे खड़े होकर ‘कबीर’ कहने लगे। छ: घण्टे तक यही दशा रही। लकड़ी के कुन्दों से चटाकपटाक के शब्द निकल रहे थे। पशुगण अपने-अपने खूँटों पर भय से चिल्ला रहे थे। तुलसा ने मुझसे कहा - अब की होली की ज्वाला टेढ़ी जा रही है। कुशल नहीं। जब ज्वाला सीधी जाती है, गाँव में साल-भर आनन्द की बधाई बजती है। परन्तु ज्वाला का टेढ़ी होना अशुभ है निदान लपट कम होने लगी। आँच की प्रखरता मन्द हुई। तब कुछ लोग होली के निकट आकर ध्यानपूर्वक देखने लगे। जैसे कोई वस्तु ढूँढ़ रहे हों। तुलसा ने बतलाया कि जब बसन्त के दिन होली नीवं पड़ती है, तो पहिले एक एरण्ड गाड़ देते हैं। उसी पर लकड़ी और उपलों का ढेर लगाया जाता है। इस समय लोग उस एरण्ड के पौधे का ढूँढ रहे हैं। उस मनुष्य की गणना वीरों में होती है जो सबसे पहले उस पौधे पर ऐसा लक्ष्य करे कि वह टूट कर दूर जा गिरे। प्रथम पटवारी साहब पैंतरे बदलते आये, पर दस गज की दूरी से झाँककर चल दिये। तब राधा हाथ में एक छोटा-सा सोंटा लिये साहस और दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ा और आग में घुस कर वह भरपूर हाथ लगाया कि पौधा अलग जा गिरा। लोग उन टुकड़ों को लूटने लगे। माथे पर उसका टीका लगाते हैं और उसे शुभ समझते हैं।

यहाँ से अवकाश पाकर पुरुष-मण्डली देवीजी के चबूतरे की ओर बढ़ी। पर यह न समझना, यहाँ देवीजी की प्रतिष्ठा की गई होगी। आज वे भी गालियाँ सुनना पसन्द करती हैं। छोटे-बड़े सब उन्हें अश्लील गालियाँ सुना रहे थे। अभी थोड़े दिन हुए उन्हीं देवीजी की पूजा हुई थी। सच तो यह है कि गाँवों में आजकल ईश्वर को गाली देना भी क्षम्य है। माता-बहिनों की तो कोई गणना नहीं।

प्रभात होते ही लाला ने महाराज से कहा- आज कोई दो सेर भंग पिसवा लो। दो प्रकारी की अलग-अलग बनवा लो। सलोनी आ मीठी। महाराज निकले और कई मनुष्यों को पकड़ लाये। भांग पीसी जाने लगी। बहुत से कुल्हड़ मँगाकर क्रमपूर्वक रखे गये। दो घड़ों में दोनो प्रकार की भांग रखी गयी। फिर क्या था, तीन-चार घण्टों तक पियक्कड़ों का ताँता लगा रहा। लोग खूब बखान करते थे और गर्दन हिला- हिलाकर महाराज की कुशलता की प्रशंसा करते थे। जहाँ किसी ने बखान किया कि महाराज ने दूसरा कुल्हड़ भरा बोले - ये सलोनी है। इसका भी स्वाद चखलो। अजी पी भी लो। क्या दिन-दिन होली आयेगी कि सब दिन हमारे हाथ की बूटी मिलेगी? इसके उत्तर में किसान ऐसी दृष्टि से ताकता था, मानो किसी ने उसे संजीवन रस दे दिया और एक की जगह तीन-तीन कुल्हड़ चट कर जाता। पटवारी कक जामाता मुन्शी जगदम्बा प्रसाद साहब का शुभागमन हुआ है। आप कचहरी में अरायजनवीस हैं। उन्हें महाराज ने इतनी पिला दी कि आपे से बाहर हो गये और नाचने-कूदने लगे। सारा गाँव उनसे पोदरी करता था। एक किसान आता है और उनकी ओर मुस्कराकर कहता है- तुम यहाँ ठाढ़ी हो, घर जाके भोजन बनाओ, हम आवत हैं। इस पर बड़े जोर की हँसी होती है, काशी भर मद में माता लट्ठा कन्धे पर रखे आता और सभास्थित जनों की ओर बनावटी क्रोध से देखकर गरजता है - महाराज, अच्छी बात नहीं है कि तुम हमारी नयी बहुरिया से मजा लूटते हो। यह कहकर मुन्शीजी को छाती से लगा लेता है।

मुंशीजी बेचारे छोटे कद के मनुष्य, इधर-उधर फड़फड़ाते हैं, पर नक्कारखाने मे तूती की आवाज कौन सुनता है? कोई उन्हें प्यार करता है और ग़ले लगाता है। दोपहर तक यही छेड़-छाड़ हुआ की। तुलसा अभी तक बैठी हुई थी। मैंने उससे कहा- आज हमारे यहाँ तुम्हारा न्योता है। हम तुम संग खायेंगी। यह सुनते ही महराजिन दो थालियों में भोजन परोसकर लायी। तुलसा इस समय खिड़की की ओर मुँह करके खड़ी थी। मैंने जो उसको हाथ पकड़कर अपनी और खींचा तो उसे अपनी प्यारी-प्यारी आँखों से मोती के सोने बिखेरते हुए पाया। मैं उसे गले लगाकर बोली- सखी सच-सच बतला दो, क्यों रोती हो? हमसे कोई दुराव मत रखो। इस पर वह और भी सिसकने लगी। जब मैंने बहुत हठ की, उसने सिर घुमाकर कहा - बहिन! आज प्रात:काल उन पर निशान पड़ गया। न जाने उन पर क्या बीत रही होगी। यह कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगी। ज्ञात हुआ कि राधा के पिता ने कुछ ऋण लिया था। वह अभी तक चुका न सका था। महाजन ने सोचा कि इसे हवालात ले चलूँ तो रुपये वसूल हो जायें। राधा कन्नी काटता फिरता था। आज द्वेषियों को अवसर मिल गया और वे अपना काम कर गये। शोक! मूल धन रुपये से अधिक न था। प्रथम मुझ ज्ञात होता तो बेचारे पर त्योहार के दिन यह आपत्ति न आने पाती। मैंने चुपके से महाराज को बुलाया और उन्हें बीस रुपये देकर राधा को छुड़ाने के लिये भेजा।

उस समय मेरे द्वार पर एक टाट बिछा दिया गया था। लालाजी मध्य में कालीन पर बैठे थे। किसान लोग घुटने तक धोतियाँ बाँधे, कोई कुर्ती पहिने कोई नग्न देह, कोई सिर पर पगड़ी बाँधे और नंगे सिर, मुख पर अबीर लगाये- जो उनके काले वर्ण पर विशेष छटा दिखा रही थी- आने लगे। जो आता, लालाजी के पैरों पर थोड़ी-सी अबीर रख देत। लालाली भी अपने तश्तरी में से थोड़ी-सी अबीर निकालकर उसके माथे पर लगा देते और मुस्कुराकर कोई दिल्लगी की बात कर देते थे। वह निहाल हो जाता, सादर प्रणाम करता और ऐसा प्रसन्न होकर आ बैठता, मानो किसी रंक ने रत्न- राशि पायी है। मुझे स्पप्न में भी ध्यान न था कि लालाजी इन उजड्ड देहातियों के साथ बैठकर ऐसे आनन्द से वर्तालाप कर सकते हैं। इसी बीच में काशी भर आया। उसके हाथ में एक छोटी-सी कटोरी थी। वह उसमें अबीर लिए हुए था। उसने अन्य लोगों की भाँति लालाजी के चरणों पर अबीर नहीं रखी, किंतु बड़ी धृष्टता से मुट्ठी-भर लेकर उनके मुख पर भली-भाँति मल दी। मैं तो डरी, कहीं लालाजी रुष्ट न हो जायँ। पर वह बहुत प्रसन्न हुए और स्वयं उन्होंने भी एक टीका लगाने के स्थान पर दोनों हाथों से उसके मुख पर अबीर मली। उसके सी उसकी ओर इस दृष्टि से देखते थे कि निस्संदेह तू वीर है और इस योग्य है कि हमारा नायक बने। इसी प्रकार एक-एक करके दो-ढाई सौ मनुष्य एकत्र हुए! अचानक उन्होंने कहा - आज कहीं राधा नहीं दीख पड़ता, क्या बात है? कोई उसके घर जाके देखा तो। मुंशी जगदम्बा प्रसाद अपनी योग्यता प्रकाशित करने का अच्छा अवसर देखकर बोल उठे - हजूर वह दफा 13 नं. अलिफ ऐक्ट (अ) में गिरफ्तार हो गया। रामदीन पांडे ने वारण्ट जारी करा दिया। हरीच्छा से रामदीन पांडे भी वहाँ बैठे हुए थे। लाला सने उनकी ओर परम तिरस्कार दृष्टि से देखा और कहा - क्यों पांडेजी, इस दीन को बन्दीगृह में बन्द करने से तुम्हारा घर भर जायगा? यही मनुष्यता और शिष्टता अब रह गयी है। तुम्हें तनिक भी दया न आयी कि आज होली के दिन उसे स्त्री और बच्चों से अलग किया। मैं तो सत्य कहता हूँ कि यदि मैं राधा होता, तो बन्दीगृह से लौटकर मेरा प्रथम उद्योग यही होता कि जिसने मुझे यह दिन दिखाया है, उसे मैं भी कुछ दिनों हल्दी पिलवा दूँ। तुम्हें लाज नहीं आती कि इतने बड़े महाजन होकर तुमने बीस रुपये के लिए एक दीन मनुष्य को इस प्रकार कष्ट में डाला। डूब मरना था ऐसे लोभ पर! लालाजी को वस्तुत: क्रोध आ गया था। रामदीन ऐसा लज्जित हुआ कि सब सिट्टी-पिट्टी भूल गयी। मुख से बात न निकली। चुपके से न्यायालय की ओर चला। सब-के-सब कृषक उसकी ओर क्रोध-पूर्ण दृष्टि से देख रहे थे। यदि लालाजी का भय न होता तो पांडेजी की हड्डी-पसली वहीं चूर हो जाती।

इसके पश्चात लोगों ने गाना आरम्भ किया। मद में तो सब-के-सब गाते ही थे, इस पर लालजी के भ्रातृ-भाव के सम्मान से उनके मन और भी उत्साहित हो गये। खूब जी तोड़कर गाया। डफें तो इतने जोर से बजती थीं कि अब फटी और तब फटीं। जगदम्बाप्रसाद ने दुहरा नशा चढ़ाया था। कुछ तो उनके मन में स्वत: उमंग उत्पन्न हुई, कुछ दूसरों ने उत्तेजना दी। आप मध्य सभा में खड़ा होकर नाचने लगे; विश्वास मानो, नाचने लगे। मैंने अचकन, टोपी, धोती और मूँछोंवाले पुरुष को नाचते न देखा था। आध घण्टे तक वे बन्दरों की भाँति उछलते-कूदते रहे। निदान मद ने उन्हें पृथ्वी पर लिटा दिया। तत्पश्चात् एक और अहीर उठा, एक अहीरिन भी मण्डली से निकली और दोनों चौक में जाकर नाचने लगे। दोनों नवयुवक फुर्तीले थे। उनकी कमर और पीठ की लचक विलक्षण थी। उनके हाव-भाव, कमर का लचकना, रोम-रोम का फड़कना, गर्दन का मोड़, अंगों का मरोड़ देखकर विस्मय होता था। बहुत अभ्यास और परिश्रम का कार्य है।

अभी यहाँ नाच हो ही रहा था कि सामने बहुत-से मनुष्य लंबी-लंबी लाठियाँ कन्धों पर रखे आते दिखायी दिये। उनके संग डफ भी था। कई मनुष्य हाथों से झाँझ और मजीरे लिये हुए थे। वे गाते-बजाते आये और हमारे द्वार पर रुके। अकस्मात तीन- चार मुनष्यों ने मिलकर ऐसे आकाशभेदी शब्दों में ‘अररर...कबीर’ की ध्वनि लगायी कि घर काँप उठा। लालाजी निकले। ये लोग उसी गाँव के थे, जहाँ निकासी के दिन लाठियाँ चली थीं। लालाजी को देखते ही कई पुरुषों ने उनके मुख पर अबीर मला। लालाजी ने भी प्रत्युत्तर दिया। फिर लोग फर्श पर बैठे। इलायची और पान से उनका सम्मान किया। फिर गाना हुआ। इस गाँववालों ने भी अबीर मलीं और मलवायी। जब ये लेग बिदा होने लगे, तो यह होली गायी:

‘सदा आनन्द रहे हि द्वारे मोहन खेलें होरी।’

कितना सुहावना गीत है! मुझे तो इसमें रस और भाव कूट-कूटकर भरा हुआ प्रतीत होता है। होली का भाव कैसे साधारण और संक्षिपत शब्दों में प्रकट कर दिया गया है। मैं बारम्बार यह प्यारा गीत गाती हूँ, आनन्द लूटती हूँ। होली का त्योहार परस्पर प्रेम और मेल बढ़ाने के लिए है। सम्भव न था कि वे लोग, जिनसे कुछ दिन पहले लाठियाँ चली थीं, इस गाँव में इस प्रकार बेधड़क चले आते। पर यह होली का दिन है। आज किसी को किसी से द्वेष नहीं है। आज प्रेम और आनन्द का स्वराज्य है। आज के दिन यदि दुखी हो तो परदेशी बालम की अबला। रोवे तो युवती विधवा ! इनके अतिरिक्त और सबके लिए आनन्द की बधाई है।

सन्ध्या-समय गाँव की सब स्त्रियाँ हमारे यहाँ खेलने आयीं। मातजी ने उन्हें बड़े आदर से बैठाया। रंग खेला, पान बाँटा। मैं मारे भय के बाहर न निकली। इस प्रकार छुट्टी मिली। अब मुझे ध्यान आया कि माधवी दोपहर से गायब है। मैंने सोचा था शायद गाँव में होली खेलने गयी हो। परन्तु इन स्त्रियों के संग न थी। तुलसा अभी तक चुपचाप खिड़की की ओर मुँह किये बैठी थी। दीपक में बत्ती पड़ी रही थी कि वह अकस्मात् उठी, मेरे चरणों पर गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी। मैंने खिड़की की ओर झाँका तो देखती हूँ कि आगे-आगे महाराज, उसके पीछे राधा और सबसे पीछे रामदीन पांडे चल रहे हैं। गाँव के बहत से आदमी उनके संग है। राधा का बदन कुम्हलाया हुआ है। लालाजी ने ज्योंही सुना कि राधा आ गया, चट बाहर निकल आये और बड़े स्नेह से उसको कण्ठ से लगा लिया, जैसे कोई अपने पुत्र को गले से लगाता है। राधा चिल्ला-चिल्लाकर के चरणों में गिर पड़ी। लालाजी ने उसे भी बड़े प्रेम से उठाया। मेरी आँखों में भी उस समय आँसू न रुक सके। गाँव के बहुत से मनुष्य रो रहे थे। बड़ा करुणापूर्ण दृश्य था। लालाजी के नेत्रों में मैंने कभी आँसू ने देखे थे। वे इस समय देखे। रामदीन पाण्डेय मस्तक झुकाये ऐसा खड़ा था, माना गौ-हत्या की हो। उसने कहा - मेरे रुपये मिल गये, पर इच्छा है, इनसे तुलसा के लिए एक गाय ले दूँ।

राधा और तुलसा दोनों अपने घर गये। परन्तु थोड़ी देर में तुलसा माधवी का हाथ पकड़े हँसती हुई मेरे घर आयी बोली - इनसे पूछो, ये अब तक कहाँ थीं?

मैं - कहाँ थी? दोपहर से गायब हो?

माधवी - यहीं तो थी।

मैं - यहाँ कहाँ थीं? मैंने तो दोपहर से नहीं देखा। सच-सच बता दो मैं रुष्ट न होऊँगी।

माधवी - तुलसा के घर तो चली गयी थी।

मैं - तुलसा तो यहाँ बैठी है, वहाँ अकेली क्या सोती रहीं?

तुलसा - (हँसकर) सोती काहे को जागती रही। भोजन बनाती रही, बरतन चौका करती रही।

माधवी - हाँ, चौका-बरतन करती रही। कोई तुम्हार नौकर लगा हुआ है न!

ज्ञात हुअ कि जब मैंने महाराज को राधा को छुड़ाने के लिए भेजा था, तब से माधवी तुलसा के घर भोजन बनाने में लीन रही। उसके किवाड़ खोले। यहाँ से आटा, घी, शक्कर सब ले गयी। आग जलायी और पूड़ियाँ, कचौड़ियाँ, गुलगुले और मीठे समोसे सब बनाये। उसने सोचा था कि मैं यह सब बताकर चुपके से चली जाँऊगी। जब राधा और तुलसा जायेंगे, तो विस्मित होंगे कि कौन बना गया! पर स्यात् विलम्ब अधिक हो गया और अपराधी पकड़ लिया गया। देखा, कैसी सुशीला बाला है।

अब विदा होती हूँ। अपराध क्षमा करना। तुम्हारी चेरी हूँ जैसे रखोगे वैसे रहूँगी। यह अबीर और गुलाल भेजती हूँ। यह तुम्हारी दासी का उपहार है। तुम्हें हमारी शपथ मिथ्या सभ्यता के उमंग में आकर इसे फेंक न देना, नहीं तो मेरा हृदय दुखी होगा।

तुम्हारी,

विरजन



(5)



मझगाँव



‘प्यारे!

तुम्हारे पत्र ने बहुत रुलाया। अब नहीं रहा जाता। मुझे बुला लो। एक बार देखकर चली आऊँगी। सच बताओ, यदि मैं तुम्हारे यहाँ आ जाऊँ, तो हँसी तो न उड़ाओगे? न जाने मन में क्या समझोगे? पर कैसे आऊँ? तुम लालाजी को लिखो खूब! कहेंगे यह नयी धुन समायी है।

कल चारपाई पर पड़ी थी। भोर हो गया था, शीतल मन्द पवन चल रहा था कि स्त्रियाँ गाने का शब्द सुनायी पड़ा। स्त्रियाँ अनाज का खेत काटने जा रही थीं। झाँककर देखा तो दस-दस बारह-बारह स्त्रियों का एक-एक गोल था। सबके हाथों में हंसिया, कन्धों पर गाठियाँ बाँधने की रस्स ओर सिर पर भुने हुए मटर की छबड़ी थी। ये इस समय जाती हैं, कहीं बारह बजे लौंटेगी। आपस में गाती, चुहलें करती चली जाती थीं।

दोपहर तक बड़ी कुशलता रही। अचानक आकाश मेघाच्छन्न हो गया। आँधी आ गयी और ओले गिरने लगे। मैंने इतने बड़े ओले गिरते न देखे थे। आलू से बड़े और ऐसी तेजी से गिरे जैसे बन्दूक से गोली। क्षण-भर में पृथ्वी पर एक फुट ऊंचा बिछावन बिछ गया। चारों तरफ से कृषक भागने लगे। गायें, बकरियाँ, भेड़ें सब चिल्लाती हुई पेड़ों की छाया ढूँढ़ती, फिरती थीं। मैं डरी कि न-जाने तुलसा पर क्या बीती। आंखें फैलाकर देखा तो खुले मैदान में तुलसा, राधा और मोहिनी गाय दीख पड़ीं। तीनों घमासान ओले की मार में पड़े थे! तुलसा के सिर पर एक छोटी-सी टोकरी थी और राधा के सिर पर एक बड़ा-सा गट्ठा। मेरे नेत्रों में आंसू भर आये कि न जाने इन बेचारों की क्या गति होगी। अकस्मात एक प्रखर झोंके ने राधा के सिर से गट्ठा गिरा दिया। गट्ठा का गिरना था कि चट तुलसा ने अपनी टोकरी उसके सिर पर औंधा दी। न-जाने उस पुष्प ऐसे सिर पर कितने ओले पड़े। उसके हाथ कभी पीठ पर जाते, कभी सिर सुहलाते। अभी एक सेकेण्ड से अधिक यह दशा न रही होगी कि राधा ने बिजली की भाँति झपककर गट्ठा उठा लिया और टोकरी तुलसा को दे दी। कैसा घना प्रेम है!

अनर्थकारी दुर्देव ने सारा खेल बिगाड़ दिया! प्रात:काल स्त्रियाँ गाती हुई जा रही थीं। सन्ध्या को घर-घर शोक छाया हुआ था। कितनों के सिर लहू-लुहान हो गये, कितने हल्दी पी रहे हैं। खेती सत्यानाश हो गयी। अनाज बर्फ के तले दब गया। ज्वर का प्रकोप हैं सारा गाँव अस्पताल बना हुआ है। काशी भर का भविष्य प्रवचन प्रमाणित हुआ। होली की ज्वाला का भेद प्रकट हो गया। खेती की यह दशा और लगान उगाहा जा रहा है। बड़ी विपत्ति का सामना है। मार-पीट, गाली, अपशब्द सभी साधनों से काम लिया जा रहा है। दोंनों पर यह दैवी कोप!

तुम्हारी

विरजन



(6)

मझगाँव

मेरे प्राणधिक प्रियतम,

पूरे पन्द्रह दिन के पश्चात् तुमने विरजन की सुधि ली। पत्र को बारम्बार पढ़ा। तुम्हारा पत्र रुलाये बिना नहीं मानता। मैं यों भी बहुत रोया करती हूँ। तुमको किन-किन बातों की सुधि दिलाऊँ? मेरा हृदय निर्बल है कि जब कभी इन बातों की ओर ध्यान जाता है तो विचित्र दशा हो जाती है। गर्मी-सी लगती है। एक बड़ी व्यग्र करने वाली, बड़ी स्वादिष्ट, बहुत रुलानेवाली, बहुत दुराशापूर्ण वेदना उत्पन्न होती है। जानती हूँ कि तुम नहीं आ रहे और नहीं आओगे; पर बार-बार जाकर खड़ी हो जाती हूँ कि आ तो नहीं गये।

कल सायंकाल यहाँ एक चित्ताकर्षक प्रहसन देखने में आया। यह धोबियों का नाच था। पन्द्रह-बीस मनुष्यों का एक समुदाय था। उसमे एक नवयुवक श्वेत पेशवाज पहिने, कमर में असंख्य घंटियाँ बाँधे, पाँव में घुघँरु पहिने, सिर पर लाल टोपी रखे नाच रहा था। जब पुरुष नाचता था तो मृदंग बजने लगती थी। ज्ञात हुआ कि ये लोग होली का पुरस्कार माँगने आये हैं। यह जाति पुरस्कार खूब लेती है। आपके यहाँ कोई काम-काज पड़े उन्हें पुरस्कार दीजिये; और उनके यहाँ कोई काम-काज पड़े, तो भी उन्हें पारितोषिक मिलना चाहिए। ये लोग नाचते समय गीत नहीं गाते। इनका गाना इनकी कविता है। पेशवाजवाला पुरुष मृदंग पर हाथ रखकर एक विरहा कहता है। दूसरा पुरुष सामने से आकर उसका प्रत्युत्तर देता है और दोनों तत्क्षण वह विरहा रचते हैं। इस जाति में कवित्व-शक्ति अत्यधिक है। इन विरहों को ध्यान से सुनो तो उनमे बहुधा उत्तम कवित्व भाव प्रकट किये जाते हैं। पेशवाजवाले पुरुषों ने प्रथम जो विरहा कहा था, उसका यह अर्थ कि ऐ धोबी के बच्चों! तुम किसके द्वार पर आकर खड़े हो? दूसरे ने उत्तर दिया - अब न अकबर शाह है न राजा भोज, अब जो हैं हमारे मालिक हैं उन्हीं से माँगो। तीसरे विरहा का अर्थ यह है कि याचकों की प्रतिष्ठा कम होती है अतएव कुछ मत माँगो, गा-बाजकर चले चलो, देनेवाला बिन माँगे ही देगा। घण्टे-भर से ये लोग विरहे कहते रहे। तुम्हें प्रतति न होगी, उनके मुख से विरहे इस प्रकार बेधड़क निकलते थे कि आश्चर्य प्रकट होता था। स्यात इतनी सुगमता से वे बातें भी न कर सकते हों। यह जाति बड़ी पियक्कड़ है। मदिरा पानी की भाँति पीती है। विवाह में मदिरा गौने में मदिरा, पूजा-पाठ में मदिरा। पुरस्कार माँगेंगे तो पीने के लिए। धुलाई माँगेंगे तो यह कहकर कि आज पीने के लिए पैसे नहीं हैं। विदा होते समय बेचू धोबी ने जो विरहा कहा था, वह काव्यालंकार से भरा हुआ है। तुम्हारा परिवार इस प्रकार बढ़े जैसे गंगा जी का जल। लड़के फूले-फलें, जैसे आम का बौर। मालकिन को सोहाग सदा बना रहे, जैसे दूब की हरियाली। कैसी अनोखी कविता है।

तुम्हारी

विरजन

(7)



मझगाँव



प्यारे,

एक सप्ताह तक चुप रहने की क्षमा चाहती हूँ। मुझे इस सप्ताह में तनिक भी अवकाश न मिला। माधवी बीमार हो गयी थी। पहले तो कुनैन की कई पुड़ियाँ खिलायी गयीं पर जब लाभ न हुआ और उसकी दशा और भी बुरी होने लगी तो, दिहलूराय वैद्य बुलाये गये। कोई पचास वर्ष की आयू होगी। नंगे पाँव सिर पर एक पगड़ी बाँधे, कन्धे पर अंगोछा रखे, हाथ में मोटा-सा सोटा लिये द्वार पर आकर बैठ गये। घर के जमींदार हैं, पर किसी ने उनके शरीर में मिजई तक नहीं देखी। उन्हें इतना अवकाश ही नहीं कि अपने शरीर-पालन की ओर ध्यान दे। इस मंडल में आठ-दस कोस तक के लोग उन पर विश्वास करते हैं। न वे हकीम को लाने, न डाक्टर को। उनके हकीम-डाक्टर जो कुछ हैं वे दिहलूराय है। सन्देशा सुनते ही आकर द्वार पर बैठ गये। डाक्टरों की भाँति नहीं कि प्रथम सवारी माँगेंगे - वह भी तेज जिसमें उनका समय नष्ट न हो। आपके घर ऐसे बैठे रहेंगे, मानों गूँगे का गुड़ खा गये हैं। रोगी को देखने जायेंगे तो इस प्रकार भागेंगे मानो कमरे की वायु में विष भरा हुआ है। रोग परिचय और औषधि का उपचार केवल दो मिनट में समाप्त। दिहलूराय डाक्टर नहीं हैं- पर जितने मनुष्यों को उनसे लाभ पहुँचता हैं, उनकी संख्या का अनुमान करना कठिन है। वह सहानुभूति की मूर्ति है। उन्हें देखते ही रेगी का आधा रोग दूर हो जाता है। उनकी औषधियाँ ऐसी सुगम और साधारण होती हैं कि बिना पैसा-कौड़ी मनों बटोर लाइए। तीन ही दिन में माधवी चलने-फिरने लगी। वस्तुत: उस वैद्य की औषधि में चमत्कार है।

यहाँ इन दिनों मुगलिये ऊधम मचा रहे हैं। ये लोग जाड़े में कपड़े उधार दे देते हैं और चैत में दाम वसूल करते हैं। उस समय कोई बहाना नहीं सुनते। गाली-गलौज मार-पीट सभी बातों पर उतरा आते हैं। दो-तीन मनुष्यों को बहुत मारा। राधा ने भी कुछ कपड़े लिये थे। उनके द्वार पर जाके सब-के-सब गालियाँ देने लगे। तुलसा ने भीतर से किवाड़ बन्द कर दिये। जब इस प्रकार बस न चला, तो एक मोहनी गाय को खूँटे से खोलकर खींचते हुए ले चला। इतने में राधा दूर से आता दिखाई दिया। आते ही आते उसने लाठी का वह हाथ मारा कि एक मुगलिये की कलाई लटक पड़ी। तब तो मुगलिये कुपित हुए, पैंतरे बदलने लगे। राधा भी जान पर खेन गया और तीन दुष्टों को बेकार कर दिया। इतने काशी भर ने आकर एक मुगलिये की खबर ली। दिहलूराय को मुगालियों से चिढ़ है। साभिमान कहा करते हैं कि मैंने इनके इतने रुपये डुबा दिये इतनों को पिटवा दिया कि जिसका हिसाब नहीं। यह कोलाहल सुनते ही वे भी पहुँच गये। फिर तो सैकड़ो मनुष्य लाठियाँ ले-लेकर दौड़ पड़े। उन्होंने मुगलियों की भली-भाँति सेवा की। आशा है कि इधर आने का अब साहस न होगा।

अब तो मई का मास भी बीत गया। क्यों अभी छुट्टी नहीं हुई? रात-दिन तम्हारे आने की प्रतीक्षा है। नगर में बीमारी कम हो गई है। हम लोग बुहत शीघ्र यहाँ से चले जाएँगे। शोक! तुम इस गाँव की सैर न कर सकोगे।

तुम्हारी

विरजन

आत्म-संगीत

आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राण-पोषिणी घ्वनियॉँ इस निस्तब्ध और तमोमय दृश्य पर इस प्रकाश छा रही थी, जैसे हृदय पर आशाऍं छायी रहती हैं, या मुखमंडल पर शोक।
रानी मनोरमा ने आज गुरु-दीक्षा ली थी। दिन-भर दान और व्रत में व्यस्त रहने के बाद मीठी नींद की गोद में सो रही थी। अकस्मात् उसकी ऑंखें खुलीं और ये मनोहर ध्वनियॉँ कानों में पहुँची। वह व्याकुल हो गयी—जैसे दीपक को देखकर पतंग; वह अधीर हो उठी, जैसे खॉँड़ की गंध पाकर चींटी। वह उठी और द्वारपालों एवं चौकीदारों की दृष्टियॉँ बचाती हुई राजमहल से बाहर निकल आयी—जैसे वेदनापूर्ण क्रन्दन सुनकर ऑंखों से ऑंसू निकल जाते हैं।
सरिता-तट पर कँटीली झाड़िया थीं। ऊँचे कगारे थे। भयानक जंतु थे। और उनकी डरावनी आवाजें! शव थे और उनसे भी अधिक भयंकर उनकी कल्पना। मनोरमा कोमलता और सुकुमारता की मूर्ति थी। परंतु उस मधुर संगीत का आकर्षण उसे तन्मयता की अवस्था में खींचे लिया जाता था। उसे आपदाओं का ध्यान न था।
वह घंटों चलती रही, यहॉँ तक कि मार्ग में नदी ने उसका गतिरोध किया।

2

मनोरमा ने विवश होकर इधर-उधर दृष्टि दौड़ायी। किनारे पर एक नौका दिखाई दी। निकट जाकर बोली—मॉँझी, मैं उस पार जाऊँगी, इस मनोहर राग ने मुझे व्याकुल कर दिया है।
मॉँझी—रात को नाव नहीं खोल सकता। हवा तेज है और लहरें डरावनी। जान-जोखिम हैं
मनोरमा—मैं रानी मनोरमा हूँ। नाव खोल दे, मुँहमॉँगी मजदूरी दूँगी।
मॉँझी—तब तो नाव किसी तरह नहीं खोल सकता। रानियों का इस में निबाह नहीं।
मनोरमा—चौधरी, तेरे पॉँव पड़ती हूँ। शीघ्र नाव खोल दे। मेरे प्राण खिंचे चले जाते हैं।
मॉँझी—क्या इनाम मिलेगा?
मनोरमा—जो तू मॉँगे।
‘मॉँझी—आप ही कह दें, गँवार क्या जानूँ, कि रानियों से क्या चीज मॉँगनी चाहिए। कहीं कोई ऐसी चीज न मॉँग बैठूँ, जो आपकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध हो?
मनोरमा—मेरा यह हार अत्यन्त मूल्यवान है। मैं इसे खेवे में देती हूँ। मनोरमा ने गले से हार निकाला, उसकी चमक से मॉझी का मुख-मंडल प्रकाशित हो गया—वह कठोर, और काला मुख, जिस पर झुर्रियॉँ पड़ी थी।
अचानक मनोरमा को ऐसा प्रतीत हुआ, मानों संगीत की ध्वनि और निकट हो गयी हो। कदाचित कोई पूर्ण ज्ञानी पुरुष आत्मानंद के आवेश में उस सरिता-तट पर बैठा हुआ उस निस्तब्ध निशा को संगीत-पूर्ण कर रहा है। रानी का हृदय उछलने लगा। आह ! कितना मनोमुग्धकर राग था ! उसने अधीर होकर कहा—मॉँझी, अब देर न कर, नाव खोल, मैं एक क्षण भी धीरज नहीं रख सकती।
मॉँझी—इस हार हो लेकर मैं क्या करुँगा?
मनोरमा—सच्चे मोती हैं।
मॉँझी—यह और भी विपत्ति हैं मॉँझिन गले में पहन कर पड़ोसियों को दिखायेगी, वह सब डाह से जलेंगी, उसे गालियॉँ देंगी। कोई चोर देखेगा, तो उसकी छाती पर सॉँप लोटने लगेगा। मेरी सुनसान झोपड़ी पर दिन-दहाड़े डाका पड़ जायगा। लोग चोरी का अपराध लगायेंगे। नहीं, मुझे यह हार न चाहिए।
मनोरमा—तो जो कुछ तू मॉँग, वही दूँगी। लेकिन देर न कर। मुझे अब धैर्य नहीं है। प्रतीक्षा करने की तनिक भी शक्ति नहीं हैं। इन राग की एक-एक तान मेरी आत्मा को तड़पा देती है।
मॉँझी—इससे भी अच्दी कोई चीज दीजिए।
मनोरमा—अरे निर्दयी! तू मुझे बातों में लगाये रखना चाहता हैं मैं जो देती है, वह लेता नहीं, स्वयं कुछ मॉँगता नही। तुझे क्या मालूम मेरे हृदय की इस समय क्या दशा हो रही है। मैं इस आत्मिक पदार्थ पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सकती हूँ।
मॉँझी—और क्या दीजिएगा?
मनोरमा—मेरे पास इससे बहुमूल्य और कोई वस्तु नहीं है, लेकिन तू अभी नाव खोल दे, तो प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुझे अपना महल दे दूँगी, जिसे देखने के लिए कदाचित तू भी कभी गया हो। विशुद्ध श्वेत पत्थर से बना है, भारत में इसकी तुलना नहीं।
मॉँझी—(हँस कर) उस महल में रह कर मुझे क्या आनन्द मिलेगा? उलटे मेरे भाई-बंधु शत्रु हो जायँगे। इस नौका पर अँधेरी रात में भी मुझे भय न लगता। ऑंधी चलती रहती है, और मैं इस पर पड़ा रहता हूँ। किंतु वह महल तो दिन ही में फाड़ खायगा। मेरे घर के आदमी तो उसके एक कोने में समा जायँगे। और आदमी कहॉँ से लाऊँगा; मेरे नौकर-चाकर कहॉँ? इतना माल-असबाब कहॉँ? उसकी सफाई और मरम्मत कहॉँ से कराऊँगा? उसकी फुलवारियॉँ सूख जायँगी, उसकी क्यारियों में गीदड़ बोलेंगे और अटारियों पर कबूतर और अबाबीलें घोंसले बनायेंगी।
मनोरमा अचानक एक तन्मय अवस्था में उछल पड़ी। उसे प्रतीत हुआ कि संगीत निकटतर आ गया है। उसकी सुन्दरता और आनन्द अधिक प्रखर हो गया था—जैसे बत्ती उकसा देने से दीपक अधिक प्रकाशवान हो जाता है। पहले चित्ताकर्षक था, तो अब आवेशजनक हो गया था। मनोरमा ने व्याकुल होकर कहा—आह! तू फिर अपने मुँह से क्यों कुछ नहीं मॉँगता? आह! कितना विरागजनक राग है, कितना विह्रवल करने वाला! मैं अब तनिक धीरज नहीं धर सकती। पानी उतार में जाने के लिए जितना व्याकुल होता है, श्वास हवा के लिए जितनी विकल होती है, गंध उड़ जाने के लिए जितनी व्याकुल होती है, मैं उस स्वर्गीय संगीत के लिए उतनी व्याकुल हूँ। उस संगीत में कोयल की-सी मस्ती है, पपीहे की-सी वेदना है, श्यामा की-सी विह्वलता है, इससे झरनों का-सा जोर है, ऑंधी का-सा बल! इसमें वह सब कुछ है, इससे विवेकाग्नि प्रज्ज्वलित होती, जिससे आत्मा समाहित होती है, और अंत:करण पवित्र होता है। मॉँझी, अब एक क्षण का भी विलम्ब मेरे लिए मृत्यु की यंत्रणा है। शीघ्र नौका खोल। जिस सुमन की यह सुगंध है, जिस दीपक की यह दीप्ति है, उस तक मुझे पहुँचा दे। मैं देख नहीं सकती इस संगीत का रचयिता कहीं निकट ही बैठा हुआ है, बहुत निकट।
मॉँझी—आपका महल मेरे काम का नहीं है, मेरी झोपड़ी उससे कहीं सुहावनी है।
मनोरमा—हाय! तो अब तुझे क्या दूँ? यह संगीत नहीं है, यह इस सुविशाल क्षेत्र की पवित्रता है, यह समस्त सुमन-समूह का सौरभ है, समस्त मधुरताओं की माधुरताओं की माधुरी है, समस्त अवस्थाओं का सार है। नौका खोल। मैं जब तक जीऊँगी, तेरी सेवा करुँगी, तेरे लिए पानी भरुँगी, तेरी झोपड़ी बहारुँगी। हॉँ, मैं तेरे मार्ग के कंकड़ चुनूँगी, तेरे झोंपड़े को फूलों से सजाऊँगी, तेरी मॉँझिन के पैर मलूँगी। प्यारे मॉँझी, यदि मेरे पास सौ जानें होती, तो मैं इस संगीत के लिए अर्पण करती। ईश्वर के लिए मुझे निराश न कर। मेरे धैर्य का अन्तिम बिंदु शुष्क हो गया। अब इस चाह में दाह है, अब यह सिर तेरे चरणों में है।
यह कहते-कहते मनोरमा एक विक्षिप्त की अवस्था में मॉँझी के निकट जाकर उसके पैरों पर गिर पड़ी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ, मानों वह संगीत आत्मा पर किसी प्रज्ज्वलित प्रदीप की तरह ज्योति बरसाता हुआ मेरी ओर आ रहा है। उसे रोमांच हो आया। वह मस्त होकर झूमने लगी। ऐसा ज्ञात हुआ कि मैं हवा में उड़ी जाती हूँ। उसे अपने पार्श्व-देश में तारे झिलमिलाते हुए दिखायी देते थे। उस पर एक आमविस्मृत का भावावेश छा गया और अब वही मस्ताना संगीत, वही मनोहर राग उसके मुँह से निकलने लगा। वही अमृत की बूँदें, उसके अधरों से टपकने लगीं। वह स्वयं इस संगीत की स्रोत थी। नदी के पास से आने वाली ध्वनियॉँ, प्राणपोषिणी ध्वनियॉँ उसी के मुँह से निकल रही थीं।
मनोरमा का मुख-मंडल चन्द्रमा के तरह प्रकाशमान हो गया था, और ऑंखों से प्रेम की किरणें निकल रही थीं।

इस्तीफा -premchand

इस्तीफा
दफ्तय का फाफू एक फेजफान जीव है। भजदूयों को ऑॊखें ददखाओ, तो वह त्मोरयम ॉँ फदर कय खडा हो जामकाह। कुरी को एक डाॉट फताओॊ, तो ससय से फोझ पेंक कय अऩनी याह रेगा। ककसी सबखायी को दुत्कायों, तो वह तुम्हायी ओय गुस्से की ननगहा से देख कय चरा जामेगा। मह ॉँ तक कक गधा बी कबी-कबी तकरीप ऩाकय दो रत्त्तम ॉँ झडने रगता हे; भगय फेचाये दफ्तय के फाफू को आऩ चाहे ऑॊखे ददखामें, ड ॉँट फतामें, दुत्कायें मा ठोकयें भायों, उसक ेेभाथे ऩय फर न आमेगा। उसे अऩने ववकायों ऩय जो अधधऩत्म होता हे, वह शामद ककसी सॊमभी साधु भें बी न हो। सॊतोष का ऩुतरा, सब्र की भूनति, सच्चा आज्ञाकायी, गयज उसभें तभाभ भानवी अच्छाइमाॉ भौजूद होती हें। खॊडहय के बी एक ददन बग्म जाते हे दीवारी के ददन उस ऩय बी योशनी होती है, फयसात भें उस ऩय हरयमारी छाती हे, प्रकृनत की ददरचत्स्ऩमों भें उसका बी दहस्सा है। भगय इस गयीफ फाफू के नसीफ कबी नहीॊ जागते। इसकी अॉधेयी तकदीय भें योशनी का जरावा कबी नहीॊ ददखाई देता। इसके ऩीरे चेहये ऩय कबी भुस्कयाहट की योश्नी नजय नहीॊ आती। इसके सरए सूखा सावन हे, कबी हया बादों नहीॊ। रारा पतहचॊद ऐसे ही एक फेजफान जीव थे। कहते हें, भनुष्म ऩय उसके नाभ का बी असय ऩडता है। पतहचॊद की दशा भें मह फात मथाथि ससद्द न हो सकी। मदद उन्हें हायचॊदकहा जाम तो कदाधचत मह अत्मुत्तत न होगी। दफ्तय भें हाय, त्जॊदगी भें हाय, सभत्रों भें हाय, जीतन भें उनके सरए चायों ओय ननयाशाऍॊ ही थीॊ। रडका एक बी नहीॊ, रडककम ॉँ ती; बाई एक बी नहीॊ, बौजाइम ॉँ दो, ग ॉँठ भें कौडी नहीॊ, भगय ददर भें आमा ओय भुयव्वत, सच्चा सभत्र एक बी नहीॊत्जससे सभत्रता हुई, उसने धोखा ददमा, इस ऩय तॊदुयस्ती बी अच्छी नहीॊफत्तीस सार की अवस्था भें फार खखचडी हो गमे थे। ऑॊखों भें ज्मोंनत नहीॊ, हाजभा चौऩट, चेहया ऩीरा, गार धचऩके, कभय झुकी हुई, न ददर भें दहम्भत, न करेजे भें ताकत। नौ फजे दफ्तय जाते औय छ: फजे शाभ को रौट कय घय आते। कपय घय से फाहय ननकरने की दहम्भत न ऩडती। दुननमा भें तमा होता है; इसकी उन्हें बफरकुर खफय न थी। उनकी दुननमा रोक-ऩयरोक जो कुछ था, दफ्तय था। नौकयी की खैय भनाते औय त्जॊदगी के ददन ऩूये कयते थे। न धभि से वास्ता था, न दीन से नाता। न कोई भनोयॊजन था, न खेर। ताश खेरे हुए बी शामद एक भु􀆧त गुजय गमी थी। 2 जाडो के ददन थे। आकाश ऩय कुछ-कुछ फादर थे। पतहचॊद साढे ऩ ॉँच फजे दफ्तय से रौटै तो धचयाग जर गमे थे। दफ्तय से आकय वह ककसी से कुछ न फोरते; चुऩके से चायऩाई ऩय रेट जाते औय ऩॊद्रह-फीस सभनट तक बफना दहरे-डुरे ऩडे यहते तफ कहीॊ जाकय उनके भुॉह से आवाज ननकरती। आज बी प्रनतददन की तयह वे चुऩचाऩ ऩडे थे कक एक ही सभनट भें फाहय से ककसी ने ऩुकाया। छोटी रडकी ने जाकय ऩूछा तो भारूभ हुआ कक दफ्तय का चऩयासी है। शायदा ऩनत के भुॉह-हाथ धाने के सरए रोटा-धगरास भ ॉँज यही थी। फोरीउससे कह दे, तमा काभ है। अबी तो दफ्तय से आमे ही हैं, औय फुरावा आ गमा है? चऩयासी ने कहा है, अबी कपय फुरा राओ। कोई फडा जरूयी काभ है। पतहचॊद की खाभोशी टूट गमी। उन्होंने ससय उठा कय ऩूछातमा फात है?
शायदाकोई नहीॊ दफ्तय का चऩयासी है। पतहचॊद ने सहभ कय कहादफ्तय का चऩयासी! तमा साहफ ने फुरामा है? शायदाह ॉँ, कहता हे, साहफ फुरा यहे है। मह ॉँ कैसा साहफ हे तुम्हायाय जफ देखा, फुरामा कयता है? सफेये के गए-गए अबी भकान रौटे हो, कपय बी फुरामा आ गमा! पतहचॊद न सॉबर कय कहाजया सुन रूॉ, ककससरए फुरामा है। भैंने सफ काभ खतभ कय ददमा था, अबी आता हूॉ। शायदाजया जरऩान तो कयते जाओ, चऩयासी से फातें कयने रगोगे, तो तुम्हें अन्दय आने की माद बी न यहेंगी। मह कह कय वह एक प्मारी भें थोडी-सी दारभोट ओय सेव रामी। पतहचॊद उठ कय खडे हो गमे, ककन्तु खाने की चीजें देख कयह चायऩाई ऩय फैठ गमे औय प्मारी की ओय चाव से देख कय चायऩाई ऩय फैठ गमे ओय प्मारी की ओय चाव से देख कय डयते हुए फोरेरडककमों को दे ददमा है न? शायदा ने ऑॊखे चढाकय कहाह ॉँ-ह ॉँ; दे ददमा है, तुभ तो खाओ। इतने भें छोटी भें चऩयासी ने कपय ऩुकायफाफू जी, हभें फडी देय हो यही हैं। शायदाकह तमों नहीॊ दते कक इस वतत न आमेंगें पतहचन्द ने जल्दी-जल्दी दारभोट की दो-तीन पॊककम ॉँ रगामी, एक धगरास ऩानी वऩमा ओय फाहय की तयप दौडे। शायदा ऩान फनाती ही यह गमी। चऩयासी ने कहाफाफू जी! आऩने फडी देय कय दी। अफ जया रऩक ेेचसरए, नहीॊ तो जाते ही ड ॉँट फतामेगा। पतहचन्द ने दो कदभ दौड कय कहाचरेंगे तो बाई आदभी ही की तयह चाहे ड ॉँट रगामें मा द ॉँत ददखामें। हभसे दौडा नहीॊ जाता। फॉगरे ही ऩय है न? चऩयासीबरा, वह दफ्तय तमों आने रगा। फादशाह हे कक ददल्रगी? चऩयासी तेज चरने का आदी था। फेचाये फाफू पतहचन्द धीये-धीये जाते थे। थोडी ही दूय चर कय ह ॉँप उठे। भगय भदि तो थे ही, मह कैसे कहते कक बाई जया औय धीये चरो। दहम्भत कयके कदभ उठातें जाते थें मह ॉँ तक कक ज ॉँघो भें ददि होने रगा औय आधा यास्ता खतभ होते-होते ऩैयों ने उठने से इनकाय कय ददमा। साया शयीय ऩसीने से तय हो गमा। ससय भें चतकय आ गमा। ऑॊखों के साभने नततसरम ॉँ उडने रगीॊ। चऩयासी ने ररकायाजया कदभ फढाम चरो, फाफू! पतहचन्द फडी भुत्श्कर से फोरेतुभ जाओ, भैं आता हूॉ। वे सडक के ककनाये ऩटयी ऩय फैठ गमे ओय ससय को दोनों हाथों से थाभ कय दभ भायने रगें चऩयासी ने इनकी मह दशा देखी, तो आगे फढा। पतहचन्द डये कक मह शैतान जाकय न-जाने साहफ से तमा कह दे, तो गजफ ही हो जामगा। जभीन ऩय हाथ टेक कय उठे ओय कपय चरें भगय कभजोयी से शयीय ह ॉँप यहा था। इस सभम कोइर फच्चा बी उन्हें जभीन ऩय धगया सकता थाॊ फेचाये ककसी तयह धगयते-ऩडते साहफ फॉगरें ऩय ऩहुॉचे। साहफ फॉगरे ऩय टहर यहे थे। फाय-फाय पाटक की तयप देखते थे औय ककसी को अतो न देख कय भन भें झल्राते थे। चऩयासी को देखते ही ऑॊखें ननकार कय फोरइतनी देय कह ॉँ था? चऩयासी ने फयाभदे की सीढी ऩय खडे-खडे कहाहुजूय! जफ वह आमें तफ तो; भै दौडा चरा आ यहा
हूॉ। साहफ ने ऩेय ऩटक कय कहाफाफू तमा फोरा? चऩयासीआ यहे हे हुजूय, घॊटा-बय भें तो घय भें से ननकरे। इतने भें ऩुतहचन्द अहाते के ताय के उॊदय से ननकर कय वह ॉँ आ ऩहुॉचे औय साहफ को ससय झुक कय सराभ ककमा। साहफ ने कडकय कहाअफ तक कह ॉँ था? पतहचनद ने साहफ का तभतभामा चेहया देखा, तो उनका खून सूख गमा। फोरेहुजूय, अबी-अबी तो दफ्तय से गमा हूॉ, ज्मों ही चऩयासी ने आवाज दी, हात्जय हुआ। साहफझूठ फोरता है, झूठ फोरता हे, हभ घॊटे-बय से खडा है। पतहचन्दहुजूय, भे झूठ नहीॊ फोरता। आने भें त्जतनी देय हो गमी होस, भगय घय से चरेन भें भुझे बफल्कुर देय नहीॊ हुई। साहफ ने हाथ की छडी घुभाकय कहाचुऩ यह सूअय, हभ घण्टा-बय से खडा हे, अऩना कान ऩकडो! पतहचन्द ने खून की घॉट ऩीकय कहाहुजूय भुझे दस सार काभ कयते हो गए, कबी.....। साहफचुऩ यह सूअय, हभ कहता है कक अऩना कान ऩकडो! पतहचन्दजफ भैंने कोई कुसूय ककमा हो? साहफचऩयासी! इस सूअय का कान ऩकडो। चऩयासी ने दफी जफान से कहाहुजूय, मह बी भेये अपसय है, भै इनका कान कैसे ऩकडूॉ? साहफहभ कहता है, इसका कान ऩकडो, नहीॊ हभ तुभको हॊटयों से भायेगा। चऩयासीहुजूय, भे माहॉ नौकयी कयने आमा हूॉ, भाय खाने नहीॊ। भैं बी इज्जतदाय आदभी हूॉ। हुजूय, अऩनी नौकयी रे रें! आऩ जो हुतभ दें, वह फजा राने को हात्जय हूॉ, रेककन ककसी की इज्जत नहीॊ बफगाड सकता। नौकयी तो चाय ददन की है। चाय ददन के सरए तमों जभाने-बय से बफगाड कयें। साहफ अफ क्रोध को न फदािश्त कयसके। हॊटय रेकय दौडे। चऩयासी ने देखा, मह ॉँ खड यहने भें खैरयमत नहीॊ है, तो बाग खडा हुआ। पतहचन्द अबी तक चुऩचाऩ खडे थे। चऩयासी को न ऩाकय उनके ऩास आमा औय उनके दोनों कान ऩकडकय दहरा ददमा। फोरातुभ सूअय गुस्ताखी कयता है? जाकय आकपस से पाइर राओ। पतहचन्द ने कान दहराते हुए कहाकौन-सा पाइर? तुभ फहया हे सुनता नहीॊ? हभ पाइर भ ॉँगता है। पतहचन्द ने ककसी तयह ददरेय होकय कहाआऩ कौन-सा पाइर भ गते हें? साहफवही पाइर जो हभ भाॉगता हे। वही पाइर राओ। अबी राओॊ वेचाये पतहचन्द को अफ ओय कुछ ऩूछने की दहम्भत न हुई साहफ फहादूय एक तो मों ही तेज-सभजाज थे, इस ऩय हुकूभत का घभॊड ओय सफसे फढकय शयाफ का नशा। हॊटय रेकय वऩर ऩडते, तो फेचाय तमा कय रेते? चुऩके से दफ्तय की तयप चर ऩडे। साहफ ने कहादौड कय जाओदौडो। पतहचनद ने कहाहुजूय, भुझसे दौडा नहीॊ जाता। साहफ, तुभ फहूत सुस्त हो गमा है। हभ तुभको दौडना ससखामेगा। दौडो (ऩीछे से धतका देकय) तुभ अफ बी नहीॊ दौडेगा?
मह कह कय साहफ हॊटय रेने चरे। पतहचन्द दफ्तय के फाफू होने ऩय बी भनुष्म ही थे। मदद वह फरवान होंते, तो उस फदभाश का खून ऩी जाते। अगय उनके ऩास कोई हधथमाय होता, तो उस ऩय ऩरूय चरा देते; रेककन उस हारत भें तो भाय खाना ही उनकी तकदीय भें सरखा था। वे फेतहाश बागे औय पाटक से फाहय ननकर कय सडक ऩय आ गमे। 3 पतहचनद दफ्तय न गमे। जाकय कयते ही तमा? साहफ ने पाइर का नाभ तक न फतामा। शामद नशा भें बूर गमा। धीये-धीये घय की ओय चरे, भगय इस फेइज्जती ने ऩैयों भें फेडडमा-सी डार दी थीॊ। भाना कक वह शायीरयक फर भें साहफ से कभ थे, उनके हाथ भें कोई चीज बी न थी, रेककन तमा वह उसकी फातों का जवाफ न दे सकते थे? उनके ऩैयो भें जूते तो थे। तमा वह जूते से काभ न रे सकते थे? कपय तमों उन्होंने इतनी त्जल्रत फदािश्त की? भगय इराज की तमा था? मदद वह क्रोध भें उन्हें गोरी भाय देता, तो उसका तमा बफगडता। शामद एक-दो भहीने की सादी कैद हो जाती। सम्बव है, दो-चाय सौ रूऩमे जुभािना हो जात। भगय इनका ऩरयवाय तो सभट्टी भें सभर जाता। सॊसाय भें कौन था, जो इनके स्त्री-फच्चों की खफय रेता। वह ककसके दयवाजे हाथ पैराते? मदद उसके ऩास इतने रूऩमे होते, त्जसे उनके कुटुम्फ का ऩारन हो जाता, तो वह आज इतनी त्जल्रत न सहते। मा तो भय ही जाते, मा उस शैतान को कुछ सफक ही दे देते। अऩनी जान का उन्हें डय न था। त्जन्दगी भें ऐसा कौन सुख था, त्जसके सरए वह इस तयह डयते। ख्मार था ससपि ऩरयवाय के फयफाद हो जाने का। आज पतहचनद को अऩनी शायीरयक कभजोयी ऩय त्जतना दु:ख हुआ, उतना औय कबी न हुआ था। अगय उन्होंने शुरू ही से तन्दुरूस्ती का ख्मार यखा होता, कुछ कसयत कयते यहते, रकडी चराना जानते होते, तो तमा इस शैतान की इतनी दहम्भत होती कक वह उनका कान ऩकडता। उसकी ऑॊखें ननकरा रेते। कभ से कभ दन्हें घय से एक छुयी रेकय चरना था! ओय न होता, तो दो-चाय हाथ जभाते हीऩीछे देखा जाता, जेर जाना ही तो होता मा औय कुछ? वे ज्मों-ज्मों आगे फढते थे, त्मों-त्मों उनकी तफीमत अऩनी कामयता औय फोदेऩन ऩय औयबी झल्राती थीॊ अगय वह उचक कय उसके दो-चाय थप्ऩड रगा देते, तो तमा होतामही न कक साहफ के खानसाभें, फैये सफ उन ऩय वऩर ऩडते ओय भायते-भायते फेदभ कय देते। फार-फच्चों के ससय ऩय जो कुछ ऩडतीऩडती। साहफ को इतना तो भारूभ हो जाता कक गयीफ को फेगुनाह जरीर कयना आसान नही। आखखय आज भैं भय जाऊॉ, तो तमा हो? तफ कौन भेये फच्चों का ऩारन कयेंगा? तफ उनके ससय जो कुछ ऩडेगी, वह आज ही ऩड जाती, तो तमा हजि था। इस अत्न्तभ ववचाय ने पतहचन्द के हृदम भें इतना जोश बय ददमा कक वह रौट ऩडे ओय साहफ से त्जल्रत का फदरा रेने के सरए दो-चाय कदभ चरे, भगय कपय खमार आमा, आखखय जो कुछ त्जल्रत होनी थी; वह तो हो ही री। कौन जाने, फॉगरे ऩय हो मा तरफ चरा गमा हो। उसी सभम उन्हें शायदा की फेकसी ओय फच्चों का बफना फाऩ के जाने का खमार बी आ गमा। कपय रौटे औय घय चरे। 4
घय भें जाते ही शायदा ने ऩूछाककससरए फुरामा था, फडी देय हो गमी? पतहचन्द ने चायऩाई ऩय रेटते हुए कहानशे की सनक थी, औय तमा? शैतान ने भुझे गासरम ॉँ दी, जरीर ककमाॊ फसस, महीॊ यट रगाए हुए था कक देय तमों की? ननदिमी ने चऩयासी से भेया कान ऩकडने को कहा। शायदा ने गुस्से भें आकय कहातुभने एक जूता उताय कय ददमा नहीॊ सूआय को? पतहचन्दचऩयासी फहुत शयीप है। उसने साप कह ददमाहुजूय, भुझसे मह काभ न होगा। भेंने बरे आदसभमों की इज्जत उतायने के सरए नौकयी नहीॊ की थी। वह उसी वतत सराभ कयके चरा गमा। शायदामही फहादुयी हे। तुभने उस साहफ को तमों नही पटकाया? पतहचन्दपटकाया तमों नहीॊभेंने बी खूफ सुनामी। वह छडी रेकय दौडाभेने बी जूता सॉबारा। उसने भुझे छडडम ॉँ जभामीॊभैंने बी कई जूते रगामे! शायदा ने खुश होकय कहासच? इतना-सा भुॉह हो गमा होगा उसका! पतहचन्दचेहये ऩय झाडू-सी कपयी हुई थी। शायदाफडा अच्छा ककमा तुभने ओय भायना चादहए था। भे होती, तो बफना जान सरए न छोडती। पतहचन्दभाय तो आमा हूॉ; रेककन अफ खैरयमत नहीॊ है। देखो, तमा नतीजा होता है? नौकयी तो जामगी ही, शामद सजा बी काटनी ऩडे। शायदासजा तमों काटनी ऩडेगी? तमा कोई इॊसाप कयने वारा नहीॊ है? उसने तमों गासरम ॉँ दीॊ, तमों छडी जभामी? पतहचन्दउसने साभने भेयी कौन सुनेगा? अदारत बी उसी की तयप हो जामगी। शायदाहो जामगी, हो जाम; भगय देख रेना अफ ककसी साहफ की मह दहम्भत न होगी कक ककसी फाफू को गासरम ॉँ दे फैठे। तुम्हे चादहए था कक ज्मोंही उसके भुॉह से गासरम ॉँ ननकरी, रऩक कय एक जूता यसीदद कय देते। पतहचन्दतो कपय इस वतत त्जॊदा रौट बी न सकता। जरूय भुझे गोरी भाय देता। शायदादेखी जाती। पतहचन्द ने भुस्कया कय कहाकपय तुभ रोग कह ॉँ जाती? शायदाजहाॉ ईश्वय की भयजी होती। आदभी के सरए सफसे फडी चीज इज्जत हे। इज्जत गव ॉँ कय फार-फच्चों की ऩयवरयश नही की जाती। तुभ उस शैतान को भाय का आमे होते तो भै करूय से पूरी नहीॊ सभाती। भाय खाकय उठते, तो शामद भै तुम्हायी सूयत से बी घृणा कयती। मों जफान से चाहे कुछ न कहती, भगय ददर से तुम्हायी इज्जर जाती यहती। अफ जो कुछ ससय ऩय आमेगी, खुशी से झेर रूॉगी.....। कह ॉँ जाते हो, सुनो-सुनो कह ॉँ जाते हो? पतहचन्द दीवाने होकय जोश भें घय से ननकर ऩडे। शायदा ऩुकायती यह गमी। वह कपय साहफ के फॉगरे की तयप जा यहे थे। डय से सहभे हुए नहीॊ; फत्ल्क गरूय से गदिन उठामे हुए। ऩतका इयादा उनके चेहये से झरक यहा था। उनके ऩैयों भें वह कभजोयी, ऑॊखें भें वह फेकसी न थी। उनकी कामाऩरट सी हो गमी थी। वह कभजोय फदन, ऩीरा भुखडा दुफिर फदनवारा, दफ्तय के फाफू की जगह अफ भदािना चेहया, दहम्भत बया हुआ, भजफूत गठा औय जवान था। उन्होंने ऩहरे एक दोस्त के घय जाकय उसक डॊडा सरमा ओय अकडते हुए साहफ के फॉगरे ऩय जा ऩहुॉचे।
इस वतत नौ फजे थे। साहफ खाने की भेज ऩय थे। भगय पतहचन्द ने आज उनके भेज ऩय से उठ जाने का दॊतजाय न ककमा, खानसाभा कभये से फाहय ननकरा औय वह धचक उठा कय अॊदय गए। कभया प्रकाश से जगभगा यहा थाॊ जभीन ऩय ऐसी कारीन बफछी हुई थी; जेसी पतहचन्द की शादी भें बी नहीॊ बफछी होगी। साहफ फहादूय ने उनकी तयप क्रोधधत दृत्ष्ट से देख कय कहातुभ तमों आमा? फाहय जाओॊ, तमों अन्दय चरा आमा? पतहचन्द ने खडे-खडे डॊडा सॊबार कय कहातुभने भुझसे अबी पाइर भ ॉँगा था, वही पाइर रेकय आमा हूॉ। खाना खा रो, तो ददखाऊॉ। तफ तक भें फैठा हूॉ। इतभीनान से खाओ, शामद वह तुम्हाया आखखयी खाना होगा। इसी कायण खूफ ऩेट बय खा रो। साहफ सन्नाटे भें आ गमे। पतहचन्द की तयप डय औय क्रोध की दृत्ष्ट से देख कय क ॊऩ उठे। पतहचन्द के चेहये ऩय ऩतका इयादा झरक यहा था। साहफ सभझ गमे, मह भनुष्म इस सभम भयने-भायने के सरए तैमाय होकय आमाहै। ताकत भें पतहचन्द उनसे ऩासॊग बी नहीॊ था। रेककन मह ननश्चम था कक वह ईट का जवाफ ऩत्थय से नहीॊ, फत्ल्क रोहे से देने को तैमाय है। मदद ऩह पतहचन्द को फुया-बरा कहते है, तो तमा आश्चमि है कक वह डॊडा रेकय वऩर ऩडे। हाथाऩाई कयने भें मद्मवऩ उन्हें जीतने भें जया बी सॊदेह नहीॊ था, रेककन फैठे-फैठामे डॊडे खाना बी तो कोई फुवद्दभानी नहीॊ है। कुत्ते को आऩ डॊडे से भारयमे, ठुकयाइमे, जो चाहे कीत्जए; भगय उसी सभम तक, जफ तक वह गुयािता नहीॊ। एक फाय गुयाि कय दौड ऩडे, तो कपय देखे आऩ दहम्भत कह ॉँ जाती हैं? मही हार उस वतत साहफ फहादुय का थाॊ जफ तक मकीन था कक पतहचन्द घुडकी, गारी, हॊटय, ठाकय सफ कुछ खाभोशी से सह रेगा,. तफ तक आऩ शेय थे; अफ वह त्मोरयम ॉँ फदरे, डडा सॉबारे, बफल्री की तयह घात रगामे खडा है। जफान से कोई कडा शब्द ननकरा औय उसने डडा चरामा। वह अधधक से अधधक उसे फयखास्त कय सकते हैं। अगय भायते हैं, तो भाय खाने का बी डय है। उस ऩय पौजदायी भें भुकदभा दामय हो जाने का सॊदेशाभाना कक वह अऩने प्रबाव औय ताकत को जेर भें डरवा देगे; ऩयन्तु ऩयेशानी औय फदनाभी से ककसी तयह न फच सकते थे। एक फुवद्दभान औय दूयॊदेश आदभी की तयह उन्होंने मह कहाओहो, हभ सभझ गमा, आऩ हभसे नायाज हें। हभने तमा आऩको कुछ कहा है? आऩ तमों हभसे नायाज हैं? पतहचन्द ने तन कयी कहातुभने अबी आध घॊटा ऩहरे भेये कान ऩकडे थे, औय भुझसे सैकडो ऊर-जरूर फातें कही थीॊ। तमा इतनी जल्दी बूर गमे? साहफभैने आऩका कान ऩकडा, आ-हा-हा-हा-हा! तमा भजाक है? तमा भैं ऩागर हूॉ मा दीवाना? पतहचन्दतो तमा भै झूठ फोर यहा हूॉ? चऩयासी गवाह है। आऩके नौकय-चाकय बी देख यहे थे। साहफकफ की फात है? पतहचन्दअबी-अबी, कोई आधा घण्टा हुआ, आऩने भुझे फुरवामा था औय बफना कायण भेये कान ऩकडे औय धतके ददमे थे। साहफओ फाफू जी, उस वतत हभ नशा भें था। फेहया ने हभको फहुत दे ददमा था। हभको कुछ खफय नहीॊ, तमा हुआ भाई गाड! हभको कुछ खफय नहीॊ। पतहचन्दनशा भें अगय तुभने गोरी भाय दी होती, तो तमा भै भय न जाता? अगय तुम्हें नशा था औय नशा भें सफ कुछ भुआप हे, तो भै बी नशे भे हूॉ। सुनो भेया पैसरा, मा तो अऩने कान ऩकडो कक कपय कबी ककसी बरे आदभी के सॊग ऐसा फतािव न कयोगे, मा भैं आकय तुम्हाये कान ऩकडूॉगा।
सभझ गमे कक नहीॊ! इधय उधय दहरो नहीॊ, तुभने जगह छोडी औय भैनें डॊडा चरामा। कपय खोऩडी टूट जाम, तो भेयी खता नहीॊ। भैं जो कुछ कहता हूॉ, वह कयते चरो; ऩकडों कान! साहफ ने फनावटी हॉसी हॉसकय कहावेर फाफू जी, आऩ फहुत ददल्रगी कयता है। अगय हभने आऩको फुया फात कहता है, तो हभ आऩसे भापी भ ॉँगता हे। पतहचन्द—(डॊडा तौरकय) नहीॊ, कान ऩकडो! साहफ आसानी से इतनी त्जल्रत न सह सके। रऩककय उठे औय चाहा कक पतहचन्द के हाथ से रकडी छीन रें; रेककन पतहचन्द गाकपर न थे। साहफ भेज ऩय से उठने न ऩामे थे कक उन्होने डॊडें का बयऩूय औय तुरा हुआ हाथ चरामा। साहफ तो नॊगे ससय थे ही; चोट ससय ऩय ऩड गई। खोऩडी बन्ना गमी। एक सभनट तक ससय को ऩकडे यहने के फाद फोरेहभ तुभको फयखास्त कय देगा। पतहचन्दइसकी भुझे ऩयवाह नहीॊ, भगय आज भैं तुभसे बफना कान ऩकडामे नहीॊ जाऊॉगा। कसान ऩकडकय वादा कयो कक कपय ककसी बरे आदभी के साथ ऐसा फेअदफी न कयोगे, नहीॊ तो भेया दूसया हाथ ऩडना ही चाहता है! मह कहकय पतहचन्द ने कपय डॊडा उठामा। साहफ को अबी तक ऩहरी चोट न बूरी थी। अगय कहीॊ मह दूसया हाथ ऩड गमा, तो शामद खोऩडी खुर जामे। कान ऩय हाथ यखकय फोरेअफ अऩ खुश हुआ? ‘कपय तो कबी ककसी को गारी न दोगे?’ ‘कबी नही।‘ ‘अगय कपय कबी ऐसा ककमा, तो सभझ रेना, भैं कहीॊ फहुत दूय नहीॊ हूॉ।‘ ‘अफ ककसी को गारी न देगा।‘ ‘अच्छी फात हे, अफ भैं जाता हूॉ, आऩ से भेया इस्तीपा है। भैं कर इस्तीपा भें मह सरखकय बेजूॉगा कक तुभने भुझे गासरम ॉँ दीॊ, इससरए भैं नौकयी नहीॊ कयना चाहता, सभझ गमे? साहफआऩ इस्तीपा तमों देता है? हभ तो हभ तो फयखास्त नहीॊ कयता। पतहचन्दअफ तुभ जैसे ऩाजी आदभी की भातहती नहीॊ करूॉगा। मह कहते हुए पतहचन्द कभये से फाहय ननकरे औय फडे इतभीनान से घय चरे। आज उन्हें सच्ची ववजम की प्रसन्नता का अनुबव हुआ। उन्हें ऐसी खुशी कबी नहीॊ प्राप्त हुई थी। मही उनके जीतन की ऩहरी जीत थी।